Friday , 24 May 2019
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हिंदी सिनेमा के इस फिल्म एडीटर को भट्ट कैंप छोड़ने के बाद ही मिली शोहरत

हिंदी सिनेमा के जिन तकनीशियनों को भट्ट कैंप छोड़ने के बाद ही कायदे की शोहरत मिली, उनमें से एक हैं फिल्म एडीटर अकीव अली. मर्डर, वो लम्हें, काइट्स, डर्टी पिक्चर, प्यार का पंचनामा, अग्निपथ  बर्फी जैसी फिल्में एडिट करने वाले अकीव की निर्माता-निर्देशक लव रंजन से लंबी दोस्ती ने उन्हें अब फिल्म निर्देशक बना दिया है. दे दे प्यार दे उनकी पहली फिल्म है, अकीव अली से एक खास मुलाकात.
ऋषिकेश मुखर्जी से लेकर डेविड धवन  अब आप तक, फिल्म एडीटर्स के निर्देशक बनने की एक लंबी परंपरा है. कितना फर्क आता है कुर्सी बदलने से? एडिटिंग का अगला पड़ाव निर्देशन है, यह मैं नहीं मानता. हां,एडिटिंग करने की वजह से मुझे बहुत ज्यादा मदद मिली है निर्देशन में. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कार्य सरल हो गया. आप कितनी भी नेट प्रैक्टिस कर लो लेकिन वास्तविक कार्य तो मैच में ही करना पड़ता है. हां, इस फिल्म के बाद मेरे नजरिए में बहुत परिवर्तन आया है. निर्देशकों को लेकर मेरे सोचने का नजरिया बदल गया. पहले मैं कई निर्देशकों का मजाक उड़ाता था अब पता चला कि कितना कठिन कार्य है.
तो इस कठिन कार्य को आपने खुद आगे बढ़कर अपनाया या फिर कहीं  से इसकी शुरूआत हुई? प्यार का पंचनामा के समय से मेरी  लव रंजन की ट्यूनिंग बनी. हम अक्सर नए नए प्रोजेक्ट्स को लेकर बातें करते रहते हैं. एक दिन उनका फोन आया. लव ने फोन पर कहा, ‘एक बहुत ही मजेदार कॉन्सेप्ट लेकर मैं फाइनेंसर से मिलने जा रहा हूं  मैं चाहता हूं कि यह फिल्म तुम निर्देशित करो.
फिल्म दे दे प्यार दे में तब्बू से लेकर अजय देवगन  रकुल प्रीत तक आयु का फासला बहुत है. कैसा अनुभव रहा इस फिल्म में उनके साथ कार्य करने का? अजय  तब्बू में कमाल की ऊर्जा है. जब आपका मुख्य कलाकार इतनी ऊर्जा के साथ कार्य करता है तो सभी को कार्य करने में मजा आता है. तब्बू जब स्क्रिप्ट पढ़ती थीं तो मैं हंसता रहता था. 5 मिनट के अंदर हम सीन शूट कर लेते थे. रकुल भी बहुत ज्यादा ऊर्जा के साथ प्रोजेक्ट पर आईं. साथ ही उनमें सीखने की चाह भी बहुत ज्यादा है. वह मुश्किल परिश्रम करने के लिए हरदम तैयार रहती हैं.
मेरा एक सवाल ऋतिक रोशन की काइट्स को लेकर है, क्या लगता है ये फिल्म क्यों नहीं चली?  आपने मेरी दुखती रग पकड़ ली. ये फिल्म मेरी बेस्ट एडिटेड फिल्मों में से एक है. अब मुझे लगता है कि काइट्स की कहानी हमने कुछ ज्यादा लंबी कर दी. फिल्म में हमने स्पैनिश भाषा के तमाम सीन डाले, होने कि सम्भावना है दर्शकों को वह पसंद न आया हो. इस फिल्म के फ्लॉप होने से मैं भी हक्का-बक्का रह गया था लेकिन ऐसी विफलताओं से ही हमें सबक मिलते हैं.
अजय देवगन को हमेशा एक्शन हीरो के तौर पर ही क्यों देखा जाता है, कॉमेडी तो वह बेहतरीन करते हैं? निर्देशक के लिए उनकी एक्शन छवि तोड़ना कितना कठिन होता है? अजय किसी इमेज में बंधे कलाकार नहीं हैं. वह एक उम्दा एक्टर हैं. वह हमेशा बहुत ठंडे दिमाग से कार्य करते हैं. दे दे प्यार दे के भूमिका के लिए हमें चाहिए भी ऐसा ही एक्टर था. कई बार तो आपको लगेगा कि फिल्म में अजय एक्टिंग कर ही नहीं रहे हैं क्योंकि ये भूमिका बहुत कुछ अच्छा वैसा है जैसा अजय सच में हैं.
तो दे दे प्यार दे के बाद कोई  फिल्म भी निर्देशित करेंगे या फिर से एडिटिंग?  फिलहाल तो निर्देशक के तौर मैंने कोई दूसरी फिल्म साइन नहीं की है. एडिटिंग मेरा जुनून है. लव रंजन की फिल्म प्रारम्भ होने वाली है, वह मुझे एडिट करनी है. फिर दे दे प्यार दे की टीम से जुड़े अंशुल की फिल्म भी एडिट करनी है. हम सब एक टीम की तरह कार्य करते हैं. हमारे बीच में किसी तरह का ईगो नहीं है, हम अच्छा कार्य करने में विश्वास रखते हैं.
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